दुर्ग जिला क¢ पाटन विकासखण्ड में कृषक¨ं क¢ आर्थिक विकास में कृषि उपज मण्डी की भूमिका
सुनील कुमार कुमेटी1, बी. एल. सोनेकर2, भारती सिंह कुमेटी3
1सहायक प्राध्यापक, अर्थषास्त्र अध्ययनषाला, पं. रविषंकर शुक्ल विष्वविद्याल रायपुर (छ.ग.)
2एसोसिएट प्राफेसर, अर्थषास्त्र अध्ययनषाला, पं. रविषंकर शुक्ल विष्वविद्याल रायपुर (छ.ग.)
3सहायक प्राध्यापक अतिथि, अर्थषास्त्र विभाग, शासकीय दू. ब. महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय रायपुर (छ.ग.)
*Corresponding Author E-mail: sunilkumeti.eco@gmail.com
ABSTRACT:
आज कृषि जीवन व्यापन का साधन मात्र ही नहीं बल्कि कृषक¨ं क¢ आर्थिक विकास का प्रमुख स्र¨त भी है। कृषि राज्य का विषय है और अधिकांष राज्य सरकारों ने पारदर्षिता और व्यापारियों के विवेकाधिकार को समाप्त करने के लिए 1950 के बाद कृषि उपज विपणन समिति अधिनियम लागू किया। जिसके अंतर्गत कृषि उपज विपणन मण्डियों की स्थापना की गई। यह समग्र रूप से सरकारी नीतियों का विस्तार है, जो खाद्य सुरक्षा, किसानों को लाभकारी मूल्य और उपभोक्ताओं के उचित मूल्य को निर्देषित करता है। कृषि उपज विपणन मण्डी क¢ अन्तर्गत उपज¨ं क¨ एकत्रित करना, उनका श्रेणीकरण व प्रमाणीकरण करना, भण्डारण, परिवहन, वितरण प्रणालियां आदि क्रियाओं क¨ किया जाता है। प्राचीन काल से ही कृषि उत्पाद¨ं की क्रय-विक्रय में बिच©लिय¨ं का ब¨लबाला रहा है जिससे किसानों क¨ उसक¢ उत्पाद¨ं की लागत भी नहीं मिल पाती थी। आजादी क¢ पष्चात् हमारे देष क¢ नीति निर्माताअ¨ं ने कृषि एवं कृषकों क¢ महत्व क¨ ध्यान में रखते हुए य¨जनाएं बनाई। जिससे भारत ने 19 वीं सदी क¢ छठवें दषक के उत्तरार्ध में अनाज अ©र कृषि उत्पाद¨ं क¢ मामले में लगभग पूर्णतः आत्मनिर्भर ह¨ गया था। भारत सरकार क¢ कृषि मंत्रालय क¢ अंतर्गत ग्रामीण विकास विभाग की कृषि-विपणन षाखा द्वारा कृषि उपज की विपणन क¢ लिए अनेक प्रयास किए गए हैं। लेकिन देष में लगभग 86 प्रतिषत कृषि योग्य भूमि का स्वामित्व छोटे एवं सीमांत कृषकों के पास है। इन किसानों के लिए विपणन योग्य अधिषेष सीमित होने के कारण मंडियों तक की परिवहन लागत को वहन करना संभव नहीं होता है। परिवहन लागत से बचने के लिए कृषकों को अपनी उपज स्थानीय व्यापारियों को ही बेचनी पड़ती है, भले ही कम कीमत पर क्यों न बेचनी पड़े। मण्डियों के व्यापक तंत्र के अभाव में छोटे व सीमांत किसानों को अपनी उपज की बिक्री के लिए स्थानीय व्यापारियों पर ही निर्भर रहना होगा।
KEYWORDS: कृषि विकास, कृषि विपणन व्यवस्था, कृषकों का आर्थिक विकास।
प्रस्तावना %&
भारत एक कृषि प्रधान देष है। हमारे देष की खुषहाली का रास्ता खेत¨ं-खलिहान¨ं अ©र गांव¨ं से ह¨कर गुजरता है। आज हमारे देष की द¨ तिहाई जनसंख्या अपनी आजीविका क¢ लिए कृषि पर निर्भर है। कृषि हमारे देष की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, तथा देष क¢ सकल घरेलू उत्पाद में वर्ष 2020-21 में 21.82 प्रतिषत (प्रचलित कीमतों पर) कृषि का योगदान रहा है। कृषि पदाथर्¨ं क¢ उत्पादन क¢ साथ-साथ भण्डारण करना आवष्यक एवं महत्वपूर्ण ह¨ता है। किसान¨ं क¢ आर्थिक कल्याण क¢ लिए विनियमित कृषि मण्डिय¨ं सम्बंधी कानून बनाया गया है। 1951 में भारत में 200 से अधिक विनियमित मण्डियाँ थी। द्वितीय य¨जना तक (अर्थात् 1961 में) 1,000 विनियमित मण्डियाँ बन चुकी थी। मार्च 2019 तक देष में 6630 कृषि मण्डिय¨ं की स्थापना की गयी थी। प्रदेष में भी छत्तीसगढ़ कृषि-उपज मण्डी अधिनियम 1972 क¢ अन्तर्गत 69 कृषि-उपज मण्डी, 118 उप मंडियों एवं 2058 प्राथमिक कृषि साख समितियों की स्थापना की गई है। यहां कृषि उपज¨ं क¨ एकत्रित करना, उनका श्रेणीकरण व प्रमाणीकरण करना, भण्डार गृह¨ं में रखना आदि क्रियाओं क¨ किया जाता है। कृषकों द्वारा उत्पादित उत्पाद¨ं की कीमत¨ं का निर्धारण बाजार अर्थात् कृषि मण्डिय¨ं में भी ह¨ता है। जहाँ कृषि उत्पाद का क्रय-विक्रय ह¨ता है। एक दक्ष कृषि विपणन व्यवस्था क¢ अन्तर्गत कृषि उपज मण्डी में विपणन की समुचित व्यवस्था का ह¨ना आवष्यक ह¨ता है। प्रदेष में अनियन्त्रित मण्डिय¨ं में कुरीतिय¨ं एवं व्यापारिय¨ं क¢ एकाधिपत्य क¢ कारण उत्पादक-कृषक¨ं क¨ प्रायः हानि उठानी पड़ती है। विपणन में प्रतिस्पर्धा क¢ अभाव, अनेक प्रकार की विपणन कट©तिय¨ं, विपणन कुरीतिय¨ं, आदि क¢ कारण कृषक¨ं क¨ अपने उत्पाद की सही-कीमत नहीं प्राप्त ह¨ती है। इन अनियमित मण्डिय¨ं में मध्यस्थ वर्ग अधिक लाभ कमा लेता है। उत्पादक कृषक अपने उत्पाद की बिक्री क¢ समय मात्र मूकदर्षक बना रहता है। कृषि मण्डिय¨ं का संचालन व्यापारिय¨ं क¢ हित¨ं क¢ अनुरूप किया जाता है, तथा उत्पाद¨ं एवं उपभ¨क्ताअ¨ं क¢ हित¨ं की उपेक्षा की जाती है। अनियमित मण्डिय¨ं की इन कुरीतिय¨ं क¨ नियमित अथवा नियन्त्रित कृषि मण्डिय¨ं की स्थापना करक¢ दूर किया जाता रहा है। जिसमें कृषक¨ं क¨ अनेक उत्पाद¨ं का उचित मूल्य दिलाने एवं प्रदेष की अर्थव्यवस्था क¨ विकास क¢ पथ पर अग्रसर करने का मुख्य लक्ष्य है।
छत्तीसगढ़ में कृषि आजिविका का प्रमुख स्रोत है। प्रदेष की लगभग 80 प्रतिषत जनसंख्या कृषि एवं कृषि आधारित उद्योगों पर आश्रित है। प्रदेष का मैदानी भाग कृषि का सर्वाधिक उपजाऊ क्षेत्र है। प्रदेष की कृषि सामान्यतः मानसून पर निर्भर है लेकिन यहां खरीफ एवं रबी दोनों फसलें उगाई जाती है। यहां का मुख्य खाद्यान्न फसल धान है। छत्तीसगढ़ कृषि संगणना रिपोर्ट 2010-11 के अनुसार प्रदेष में कुल 37.46 लाख कृषक परिवारों में से 80.45 प्रतिषत कृषक लघु एवं सीमान्त श्रेणी के कृषक, 13.42 प्रतिषत अर्द्ध मध्यम, 5.39 प्रतिषत मध्यम तथा 0.74 प्रतिषत वृहद् कृषक हैं। प्रदेष में कृषि जोतों का क्षेत्रफल 50.84 लाख हेक्टेयर तथा कृषि जोत का औसत आकार 1.36 हेक्टेयर है। प्रदेष में कृषि के महत्व को देखते हुए 2012-13 से पृथक कृषि बजट प्रस्तुत किया जाता है तथा कृषि विकास हेतु 2014-15 से किसानों को शून्य प्रतिषत ब्याज पर ऋण सुविधा उपलब्ध करायी जा रही है। वर्ष 2010 में प्रदेष की पहली किसान शाॅपिंग माॅल की स्थापना राजनांदगांव में किया गया है जहां से किसान उचित मूल्य पर कृषि उपकरण क्रय कर सकते हैं। प्रदेष को कई बार राष्ट्रीय स्तर की कृषि कर्मण पुरस्कार से भी नवाजा गया है।
अध्ययन का उद्देष्य -
1 कृषि उपज मण्डी में विपणन सुविधाअ¨ं का अध्ययन करना।
2 कृषि उपज मण्डी से कृषक¨ं क¢ आर्थिक स्थिति पर पड़ने वाले प्रभाव¨ं का अध्ययन करना।
ष¨ध प्रविधि -
कृषि उपज मण्डी की कृषकों के आर्थिक स्थिति पर पड़ने वाले प्रभाव से संबंधित प्रस्तुत अध्ययन दुर्ग जिला के पाटन विकासखण्ड से संबंधित कृषकों से संकलित प्राथमिक आंकड़ों पर आधारित है।
आंकड़¨ं का संकलन -
प्राथमिक आंकड़ों का संकलन दुर्ग जिला के पाटन विकासखण्ड में उपलब्ध दो कृषि उपज मण्डी पाटन एवं फुण्डा से संबंधित क्षेत्र के कृषकों से किया गया है। उपरोक्त दोनों मण्डियों के अंतर्गत आने वाले आठ गांवों का चयन दैव निदर्षन विधि की सहायता से किया गया है तथा चयनित प्रत्येक गांव से अध्ययन हेतु कृषकों का चयन सउद्देष्य निदर्षन विधि से क्रमषः छाटा (20), चीचा (20), देवादा (22), फुण्डा (22), गुजरा (20), मटिया (20), पन्दर (20), पाटन (20) इसप्रकार कुल 164 कृषकों का चयन किया गया है। चयनित कृषकों से प्राथमिक आंकड़ों का संकलन प्रत्यक्ष साक्षात्कार अनुसूची के माध्यम से एकत्रित किया गया है। साथ ही कृषि उपज मण्डिय¨ं में कार्यरत कर्मचारिय¨ं एवं अधिकारिय¨ं से भी प्रत्यक्ष साक्षात्कार क¢ माध्यम से प्राथमिक आंकड़ें एकत्रित किया गया है। उपरोक्तानुसार संकलित आंकड़¨ं का विष्लेषण मुख्यतः प्रतिषत विधि की सहायता से विष्लेषण किया गया है। प्रस्तुत अध्ययन उपरोक्त कृषि उपज मण्डी में 2019-20 में कृषि उपज का विपणन कर रहें कृषक¨ं तक ही सीमित है।
अध्ययन से प्राप्त आंकड़ों का विष्लेषण -
सरकार ने कृषि उत्पाद विनिमय के संबंध में हर संभव प्रयास किया है लेकिन ये प्रयास भी अनेक चुनौतियों से घिरे हैं जिसके अंतर्गत किसानों में जागरूकता का अभाव, मण्डियों की अपर्याप्त अवसंरचना, अषिक्षा व गरीबी, बिचैलियों की उपस्थिति आदि प्रमुखता से है, जिनको दूर कर किसानों के हितों को सुरक्षित रखा जा सकता है। प्रस्तुत अध्ययन से प्राप्त प्राथमिक आंकड़ों का विष्लेषण निम्नानुसार है -
सारणी क्र. 1 - पाटन विकासखण्ड के कृषक¨ं का कृषि संबंधी विवरण
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79 |
48 |
23 |
11 |
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48-17 |
29-27 |
14-02 |
6-71 |
1-83 |
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flafpr |
izfr’kr |
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izfr’kr |
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72 |
43-91 |
92 |
56-09 |
164 |
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42 |
25-61 |
122 |
74-39 |
164 |
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nks Qlyh |
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92 ¼56-09½ |
56 ¼34-15½ |
16 ¼9-76½ |
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mUur mit okys chtksa dk mi;ksx |
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gka |
ugha |
gka |
ugha |
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142 ¼86-59½ |
22 ¼13-41½ |
164 |
00 |
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izfr ,dM+ mRikndrk ¼fDoaVy esa½ |
U;wure leFkZu ewY; esa foØ; |
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flafpr 18&25 |
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gka 136 ¼82-93½ |
ugha 28 ¼17-07½ |
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स्रोत- व्यक्तिगत सर्वेक्षण पर आधारित।
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सारणी क्र. 1 से स्पष्ट है कि कुल सर्वेक्षित कृषकों में 48.17 प्रतिषत सीमांत कृषक हैं 29.27 प्रतिषत लघु कृषक, 14.02 प्रतिषत अर्ध-मध्यम कृषक, 6.71 प्रतिषत कृषक मध्यम एवं 1.83 प्रतिषत वृृहद् कृषक हैं। सबसे अधिक सीमांत कृषक एवं लघु कृषक 77.44 प्रतिषत हैं तथा सबसे कम वृहद् कृषक¨ं की संख्या 1.83 प्रतिषत है। जो कृषि जोतों के लगातार विभाजन के कारण कृषि जोतों के आकार में उत्तरोत्तर हो रही कमी का परिचायक है। पाटन विकासखण्ड में 43.91 प्रतिषत कृषि भूमि में सिंचाई सुविधा उपलब्ध है तथा 56.09 प्रतिषत कृषि भूमि असिंचित है। पाटन में अभी भी 25.61 प्रतिषत कृषकों द्वारा परम्परागत् तकनीकों के माध्यम से कृषि कार्य किये जाता है। तथा 74.39 प्रतिषत कृषक कृषि हेतु आधुनिक तकनीकों का उपयोग करते हैं। पाटन क्षेत्र के कुल कृषि भूमि में 56.09 प्रतिषत में दो फसलीय कृषि कार्य किया जा रहा है जबकि 34.15 प्रतिषत भूमि एक फसलीय तथा 9.76 प्रतिषत कृषकों द्वारा तीन फसलीय कृषि कार्य किया जा रहा है। 86.59 प्रतिषत कृषक उन्नत उपज वाले बीजों का उपयोग करते हैं जबकि 13.41 प्रतिषत कृषक परम्परागत् देषी बीजों का उपयोग करते हैं। तथा शत् प्रतिषत कृषक गोबर खाद के अलावा रासायनिक उर्वरकों का उपयोग करते हैं। फसल उत्पादकता सिंचित क्षेत्रों में 18-25 क्विंटल प्रति एकड़ तक प्राप्त होता है जबकि असिंचित क्षेत्रों में 14-16 क्विंटल प्रति एकड़ तक उत्पादकता प्राप्त होती है। पाटन क्षेत्र के 82.93 प्रतिषत कृषक अपने फसलों का विपणन कृषि उपज मण्डी की सहायता से करते हैं तथा 17.07 प्रतिषत कृषक स्थानीय साहूकार एवं व्यापारियों के पास अपने उपज का विपणन करते हैं। यहां फसल का मूल्य निर्धारण साहूकार या व्यापारियों द्वारा किया जाता है जो सरकार द्वारा घोषित समर्थन मूल्य से कम होता है। इसप्रकार कृषि उपज मण्डी की अनुपलब्धता की स्थिति में कृषकों को अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है।
सारणी क्र. 2 - मण्डी में विक्रय संबंधी सुविधाएं एवं कृषकों पर प्रभाव
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e.Mh ls d`f"k dk;ksZa esa lq/kkj |
e.Mh esas e`nk ijh{k.k lqfo/kk |
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gka 125 ¼76-22½ |
ugha 39 ¼23-78½ |
gka 60 ¼36-58½ |
ugha 104 ¼63-41½ |
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Qlyksa dh xq.koRrk laca/kh fookn |
e.Mh laca/kh f’kdk;rksa dk fuiVkjk |
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gka 54 ¼32-93½ |
ugha 110 ¼67-07½ |
gka 91 ¼55-49½ |
ugha 73 ¼44-51½ |
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O;kikfj;ksa dks foØ; ls vkfFkZd gkfu |
e.Mh esa foØ; izfØ;k lqfo/kktud |
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gka 158 ¼96-34½ |
ugha 06 ¼3-65½ |
gka 131 ¼79-87½ |
ugha 33 ¼20-12½ |
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e.Mh esa fu/kkZfjr le; esa Hkqxrku |
Hkqxrku izkIrh esa leL;k |
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gka 125 ¼76-22½ |
ugha 39 ¼23-78½ |
gka 09 ¼5-49½ |
ugha 155 ¼94-51½ |
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d`f"k ls izkIr okf"kZd 'kq) vk; ¼yk[k :- esa½ |
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1 ls de |
1&2 |
2&3 |
3&4 |
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5 ls vf/kd |
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26 |
34 |
42 |
24 |
17 |
21 |
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izfr’kr |
15-85 |
20-73 |
25-61 |
14-63 |
10-37 |
12-80 |
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e.Mh esa foØ; ls vkfFkZd fLFkfr esa lq/kkj |
vkoklh; fLFkfr esa lq/kkj |
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gka 88 ¼53-66½ |
ugha 76 ¼46-34½ |
gka 62 ¼37-80½ |
ugha 102 ¼62-20½ |
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स्रोत- व्यक्तिगत सर्वेक्षण पर आधारित।
सारणी क्र. 2 से स्पष्ट है कि पाटन विकासखण्ड के कृषकों को मण्डी में उपलब्ध सूविधाओं का प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त हो रहा है। मंडियों में कृषि विकास हेतु सूचनाओं, उन्नत उपज वाले बीज, उर्वरकों, कीटनाषकों की सुगम उपलब्धता के कारण 76.22 प्रतिषत कृषकों के कृषि कार्यों में प्रत्यक्ष सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल रहा है। तथा 23.78 प्रतिषत कृषकों को मण्डी में उपलब्ध सुविधाओं का कृषि विकास हेतु कोई विषेष लाभ प्राप्त नहीं हो रहा ंहै। इसके अतिरिक्त मृदा परीक्षण का लाभ केवल 36.58 प्रतिषत कृषकों को प्राप्त हो रहा है जबकि 63.41 प्रतिषत कृषकों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। 32.93 प्रतिषत कृषकों का मानना है कि कृषि उपज मण्डी में फसल की गुणवत्ता संबंधी विवाद का सामना पड़ता है तथा 67.07 प्रतिषत कृषकों को फसल की गुणवत्ता संबंधी किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं होती है। 79.87 प्रतिषत कृषकों को मण्डी में कृषि उपज विक्रय प्रक्रिया का प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त हो रहा है। 76.22 प्रतिषत कृषकों को निर्धारित समय पर भुगतान प्राप्त हो जाता है। 94.51 प्रतिषत कृषकों को भुगतान प्राप्ती हेतु किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं होती है। मण्डी की क्रय-विक्रय प्रक्रिया से 53.66 प्रतिषत कृषकों के आर्थिक स्थिति में सुधार के साथ ही 37.80 प्रतिषत कृषकों की आवासीय स्थिति में भी सुधार हुआ है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि कृषि उपज मण्डी द्वारा कृषकों के उपज का उचित मूल्य प्रदान कर कृषकों के आर्थिक विकास में सकारात्मक भूमिका अदा कर रही है।
निष्कर्ष एवं सुझाव -
छत्तीसगढ़ में कृषि उपज मण्डिय¨ं की स्थापना राज्य सरकार¨ं क¢ नियमानुसार ह¨ती है जहां पर कृषक निर्धारित नियम¨ं क¢ आधार पर अपनी उपज क¨ बेचता है। इन मण्डिय¨ं में सामान्यतः किसान से कर एवं शुल्क आदि के रूप में किसी प्रकार की अतिरिक्त राषि वसूल नहीं किया जाता है। सारे कर एवं शुल्क क्रेताअ¨ं से ही वसूल किए जाते हैं। कृषक क¨ अपनी उपज बिक्री का मूल्य तत्काल मिल जाता है। सरकार द्वारा भी कृषि उपज क¨ क्रय हेतु क¢न्द्र स्थापित किया जाता है जहाँ पर कृषक अपनी फसल लाकर निर्धारित मूल्य पर बेच सकते हैं। कृषि उपज मण्डी द्वारा कृषि वस्तुअ¨ं क¢ श्रेणी विभाजन तथा प्रमाणीकरण किया जाता है किसान¨ं क¨ अपनी उपज का उचित मूल्य मिलता है प्रमाणिक बार व माप-त©ल काम में लाई जाती है जिससे किसान¨ं क¢ साथ ध¨खाधडी न किया जा सक¢। उपर्युक्त तथ्य¨ं क¢ आधार पर यह कहा जा सकता है कि प्रदेष क¢ कृषि विपणन में सुधार हेतु काफी प्रयास किए गए हैं जिसक¢ परिणामस्वरूप कृषि विपणन व्यवस्था में पर्याप्त सुधार हुआ है। कृषक¨ं का दृष्टिक¨ण बदला है, व्यापारी सजग हुआ है फिर भी यदि अ©र अधिक सुधार करना है त¨ सहकारी कृषि उपज मण्डी विपणन व्यवस्था का तेजी से विकास करना ह¨गा।
पाटन क्षेत्र के मण्डिय¨ं में आधारभूत अवसंरचना का विकास करना चाहिए। जैसे - पक्की सड़कें, चबूतर¨ं, विश्रामगृह¨ं, मालवाहक वाहनों क¨ खड़ा करने क¢ लिए स्थान, सार्वजनिक ष©चालय, वर्षा आदि क¢ बचाव क¢ लिए षेड तथा पेयजल हेतु पानी की सुविधाअ¨ं आदि पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध करने की आवष्यकता है।
छत्तीसगढ़ के वर्तमान कृषि परिदृष्य को देखते हुए प्रदेष के सभी हिस्सों में मंडियों के घनत्व में वृद्धि के साथ मंडी के बुनियादी ढाँचें में निवेष बढ़ाने की आवष्यकता है। प्रदेष सरकार ने विगत् दिनों न्यूनतम समर्थन प्रणाली को ज्यादा क्षेत्रों और फसलों तक विस्तृत करने पर विषेष ध्यान दिया है जिसका कृषकों के आर्थिक विकास पर सकारात्मक प्रभाव पडे़गा। यदि राज्य सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित फसलों के उचित विपणन हेतु पर्याप्त व्यवस्था उपलब्ध करने में सफल होती है। अन्यथा यह भी कृषक एवं कृषि विकास संबंधी अन्य योजनाओं की तरह प्रभावहीन न हो जाए।
वर्तमान में भारत के कृषकों को अपनी उपज को देष के किसी भी मंडी में विक्रय हेतु 1000 कृषि उपज मंडियों को ई-राष्ट्रीय कृषि बाजार ;म.छ।डद्ध में पंजीकृत किया गया है। जिसमें प्रदेष के केवल 14 कृषि उपज मण्डी ई-राष्ट्रीय कृषि बाजार ;म.छ।डद्ध में पंजीकृत है। कृषकों को उचित मूल्य प्रदान करने हेतु प्रदेष के अन्य कृषि-उपज मंडियों को भी ई-राष्ट्रीय कृषि बाजार से जोड़ने एवं कृषकों को उससे होने वाले लाभों के प्रति जागरूक करने की आवष्यकता है। ताकि इस आॅनलाईन प्लेटफाॅर्म का अधिक से अधिक कृषक लाभ प्राप्त कर सकें।
संदर्भ सूची
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Received on 26.05.2022 Modified on 02.06.2022
Accepted on 21.06.2022 © A&V Publications All right reserved
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